न्यायपालिका बनाम भारतीय जनता पार्टी के नेता

*न्यायपालिका बनाम भारतीय जनतापार्टी के नेता*

(न्याय पालिका का सम्मान प्रत्येक नागिरक का कर्तव्य )

 

लखनऊ :20(अप्रैल ),2025, (रविवार )!

 

माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा राज्यपालों के अधिकारों को लेकर दिए गए निर्णय और वक्फ़ बिल को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा उठाए गए कुछ मूलभूत प्रश्नों को लेकर भाजपा सरकार ने पूरी न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है, उपराष्ट्रपति महोदय जो कि कभी पहले राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता से नेता होते हुए महामहिम की कुर्सी तक पहुंचे हैं, तो एकदम तिलमिला गए हैं। निशिकांत दुबे से लेकर तमाम भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता देश के मुख्य न्यायाधीश महोदय को खुले तौर पर धमका रहे हैं।

 

साथियों इस देश की न्यायपालिका इतनी भी कमजोर नहीं है कि वह इन धमकियों से डर जाए, जिस न्यायपालिका ने देश की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था, पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी को सर्वोच्च न्यायालय पहुंचकर कोर्ट में पेश होकर बयान दर्ज कराने पड़े थे उस न्यायपालिका पर कुछ तथाकथित देशभक्त सवाल उठा रहे हैं।

 

साथियों सबको पता है कि संसद द्वारा बनाया गया कानून अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके हक़ में नहीं है तो वह सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है और सर्वोच्च न्यायपालिका उस कानून की समीक्षा कर उसे रद्द या पास सकता है, ऐसा करना सर्वोच्च न्यायालय का विशेषाधिकार है।

 

मैं न्यायपालिका की आलोचना करने वाले गोबर भक्तों को बताना चाहता हूं कि जब इसी सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर के हक में फैसला सुनाया था तो दहाड़े मार मार कर देश के प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा का एक-एक कार्यकर्ता कह रहा था कि फैसला सर्वोच्च न्यायपालिका का है सभी को उसका सम्मान करना चाहिए जबकि इस बात को न्यायपालिका ने भी स्वीकार किया कि फैसला संविधान, कानून और तथ्यों को दरकिनार कर देश की बहुसंख्यक आबादी की धार्मिक भावनाओं के आधार पर किया गया है, इसी के क्रम में मैं यह बात जोड़ना चाहूंगा कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति शपथ लेने के बाद एक प्रार्थना सभा में गए तो वहां के पादरी ने बिना किसी डर, दबाव और झिझक के डोनाल्ड ट्रम्प की आंखों में आंखें डालकर सवाल करते हुए कहा की मिस्टर राष्ट्रपति महोदय इस प्रार्थना सभा में आपको इस बात की गारंटी देनी पड़ेगी कि इस देश में अगर धार्मिक रूप से किसी भी धर्म का एक भी अल्पसंख्यक यहां का नागरिक है तो आपके साथ उसका व्यवहार वही होगा जो इस देश के बहुसंख्यक धार्मिक समाज के लोगों के साथ होगा, उसे कहीं से भी असुरक्षा, डर और भय का वातावरण महसूस न होने पाए। उसकी हर तरीके से सुरक्षा, स्वतंत्रता एवं उसके अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी आपकी होगी। हमारे देश वाले तो उनके परममित्र हैं और देश को अमेरिका बनाना चाहते हैं तो कुछ उनके देशवासियों से सीख भी लें लें।

 

अंधभक्त तब न्यायपालिका को महान बता रहे थे जब इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द किया गया था, राममंदिर का फ़ैसला आया था और अनेक मामलों पर, लेकिन आज जब न्यायपालिका फिर से कोई न्याय करना चाहती है और सरकार उसके पक्ष में नहीं है तो इन्हें दोष न्यायपालिका में दिखाई पड़ने लगा। इनको शर्म भी नहीं आती जो इस देश को अमेरिका बनाना चाहते हैं उनको अमेरिका से सीखना चाहिए कि वहां की निचली अदालतें भी अमेरिका के राष्ट्रपति के आदेश पर केवल रोक ही नहीं लगा देतीं हैं बल्कि राष्ट्रपति को तलब करने की भी ताकत रखती हैं, अगर आप वास्तव में सच्चा, स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र चाहते हो तो शर्म करो इस देश की न्यायपालिका पर कीचड़ न उछालो।

 

मेरा माननीय न्यायमूर्तिगणों से भी विशेष अनुरोध है कि रिटायरमेंट के बाद सरकार द्वारा ऑफर किये जाने वाले पदों के लालच में न फंसकर सच्चाई से न्याय निर्णय करना चाहिए न कि सरकार के दबाव में काम करना चाहिए। वास्तव में आज न्यायपालिका की जो आलोचना हो रही है उसके लिए जिम्मेदार इस देश की न्यायपालिका के न्यायमूर्तिगण भी हैं अगर आप इस देश की न्यायपालिका को बचाना चाहते हो तो भले ही आप किसी भी विचारधारा से आते हो किसी भी राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हो आपको उस न्याय की कुर्सी पर बैठते ही सभी को एक समान दृष्ट से देखना होगा, सभी के साथ समान न्याय करना होगा और सभी के साथ समता, समानता का व्यवहार करना होगा तभी आपकी और आपके आने वाली पीढ़ियों की और इस न्यायपालिका की कुर्सी की इज्जत और सम्मान बरकरार रहेगा नहीं तो ख़ाक में मिलने में देर नहीं लगेगी।

 

एड० महेंद्र कुमार मंडल

अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ।

 

 

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