शीर्षक: बंदी छोड़ दिवस पर एक सवाल – क्या मुक्ति का सिद्धांत आज भी जीवित है?

 

 

 

अटल लक्ष्य न्यूज़ पोर्टल – संपादकीय

 

शीर्षक: बंदी छोड़ दिवस पर एक सवाल – क्या मुक्ति का सिद्धांत आज भी जीवित है?

 

आज दीपोत्सव का पावन पर्व है। आज ही के दिन छठे गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी ने ग्वालियर के किले से 52 राजाओं को कैद से मुक्त कराकर यह संदेश दिया था कि अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्चा धर्म है। इसी कारण उन्हें बंदी छोड़ कहा गया।

 

पर आज एक विडंबना सामने खड़ी है।

 

देश की विभिन्न जेलों में कई ऐसे सिख युवा बंद हैं, जिन्होंने अपनी निर्धारित सजा पूरी कर ली है। कानून के अनुसार सजा पूरी होने के बाद हर व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार है, यह अधिकार संविधान ने दिया है। फिर भी उनकी रिहाई पर चुप्पी क्यों है?

 

हम यह सवाल किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के सिद्धांत के लिए उठा रहे हैं। जब सजा पूरी हो जाए, तो आगे की कैद सजा नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का हनन बन जाती है।

 

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि मानवाधिकारों की बात करने वाले बड़े-बड़े संगठन, आयोग और संस्थाएं इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? क्या मानवाधिकारों की परिभाषा सबके लिए समान नहीं होनी चाहिए?

 

बंदी छोड़ दिवस हमें सिर्फ दीये जलाना नहीं सिखाता, वह हमें अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना भी सिखाता है। आज के दिन जरूरत है कि न्याय प्रणाली, सरकारें और समाज मानवीय दृष्टिकोण से इस विषय पर पुनर्विचार करें।

 

क्योंकि यदि न्याय में देरी होती है, तो वह न्याय नहीं रह जाता।

 

संपादक, अटल लक्ष्य न्यूज़ पोर्टल

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