*विषय: विकसित भारत की सांझा संस्कृति और जीवन दर्शन का महत्व*
*आलेख संपादक: कुलदीप सिंह*
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*उत्तराखंड,देहरादून।* प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2047 तक भारत को ‘विकसित भारत’ बनाने का जो संकल्प लिया है, उसकी नींव केवल स्टील-कंक्रीट की इमारतों से नहीं रखी जा सकती। विकसित भारत की असली पहचान उसकी ‘सांझा संस्कृति’ और ‘जीवन दर्शन’ में छिपी है। जब तक हम अपनी जड़ों से नहीं जुड़ेंगे, तब तक कोई भी विकास अधूरा रहेगा।
*1. सांझा संस्कृति ही भारत की असली ताकत है*
भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, एक जीवंत सभ्यता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गुजरात से अरुणाचल तक – हमारी भाषा, भोजन, वेशभूषा अलग हो सकती है, लेकिन संस्कार एक हैं। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का विचार, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की प्रार्थना, गुरु-शिष्य परंपरा, संयुक्त परिवार, अतिथि देवो भव – ये सब हमारी सांझा संस्कृति के स्तंभ हैं।
जब गृह विभाग का एक सेक्टर वार्डन रात 2 बजे गली में पहरा देता है, तो वह केवल ड्यूटी नहीं कर रहा। वह ‘राष्ट्र रक्षा’ के उसी दर्शन को जी रहा है जो हजारों साल से हमारे फौजियों और संतों ने जिया है। विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा जब हर नागरिक अपने काम को ‘राष्ट्रधर्म’ समझे।
*2. जीवन दर्शन के बिना विकास खोखला है*
पश्चिम के देशों में ऊंची-ऊंची बिल्डिंग हैं, तकनीक है, पैसा है। लेकिन वहां परिवार टूट रहे हैं, अकेलापन बढ़ रहा है, मानसिक तनाव चरम पर है। क्योंकि उनके पास ‘विकास’ है, ‘दर्शन’ नहीं।
भारत का जीवन दर्शन कहता है – ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथाः’ – त्याग के साथ भोग करो। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ – कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो। यही दर्शन एक पुलिस वाले को ईमानदारी से ड्यूटी करने की ताकत देता है, एक पत्रकार को सच लिखने का साहस देता है, एक कमांडो को जान हथेली पर रखकर देश बचाने की प्रेरणा देता है।
विकसित भारत में बुलेट ट्रेन तो चलेगी ही, लेकिन साथ में संस्कारों की ट्रेन भी चलनी चाहिए। डिजिटल इंडिया के साथ-साथ ‘डिवाइन इंडिया’ भी बनना चाहिए।
*3. आज के युवाओं के लिए संदेश*
मैं खुद 17 साल से राष्ट्र सेवा में हूं – राष्ट्र वादी संगठनों से लेकर गृह विभाग तक। मैंने देखा है कि जहां अनुशासन है, जहां संस्कृति है, वहां अपराध नहीं पनपता। जहां ‘मैं’ की जगह ‘हम’ होता है, वहां भारत अपने आप विकसित हो जाता है।
आज जरूरत है कि हम अपने बच्चों को कोडिंग के साथ-साथ गीता भी पढ़ाएं। AI के साथ-साथ आयुर्वेद भी सिखाएं। स्टार्टअप के साथ-साथ सेवा का भाव भी जगाएं। क्योंकि विकसित भारत का मतलब सिर्फ 5 ट्रिलियन इकोनॉमी नहीं, 140 करोड़ संस्कारित नागरिक भी है।
*निष्कर्ष: संकल्प से सिद्धि तक*
विकसित भारत का रास्ता दिल्ली के मंत्रालयों से नहीं, देहरादून की गलियों से, चुक्खुवाला के वार्ड से, हर घर के संस्कार से निकलेगा। जब एक सेक्टर वार्डन, एक पत्रकार, एक शिक्षक, एक किसान – सब अपने काम को ‘भारत निर्माण’ का हिस्सा मानेंगे, तभी 2047 का सपना 2040 में ही पूरा हो जाएगा।
*’सांझी संस्कृति, सबका विकास – यही है विकसित भारत का प्रकाश’*और हमारी समृद्ध संस्कृति धरोहर
*जय हिंद। वंदे मातरम्।*
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*- कुलदीप सिंह*
*आलेख संपादक, अटल लक्ष्य न्यूज पोर्टल*
*सेक्टर वार्डन, गृह विभाग उत्तराखंड*
पोस्ट 9 नॉर्थ डिवीजन, देहरादून उत्तराखंड
M/8755849325