शीर्षक: 1 नवंबर का जख्म और कांग्रेस का विरोध – क्या सिखों के दर्द पर मरहम नहीं, नमक है?*

 

 

शीर्षक: 1 नवंबर का जख्म और कांग्रेस का विरोध – क्या सिखों के दर्द पर मरहम नहीं, नमक है?

 

*नई दिल्ली।*

 

1 नवंबर की तारीख भारतीय इतिहास में स्याही से नहीं, खून से लिखी गई है।

 

1 नवंबर 1984। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की राजधानी समेत कई शहरों में जो हुआ, वो दंगा नहीं, सुनियोजित नरसंहार था। सरकारी आंकड़ों में भी 2,700 से ज्यादा सिखों की हत्या की बात कही गई, जबकि पीड़ित परिवारों और मानवाधिकार संगठनों का दावा 8,000 से 17,000 तक का है।

 

त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, कानपुर, बोकारो… गलियों में टायर जल रहे थे, घरों पर निशान लगे थे, वोटर लिस्ट से नाम ढूंढ-ढूंढ कर लोगों को मारा जा रहा था। बच्चों ने अपने पिता की पगड़ी जलते देखी, माताओं ने अपने जवान बेटों की लाशें देखीं।

 

41 साल बीत गए। कई कमीशन बने – मिश्रा कमीशन, कपूर-मित्तल कमेटी, जैन-बनर्जी कमेटी, नानावती आयोग। कुछ नेताओं को सजा हुई, कई आज भी कानूनी दांव-पेंच में बचे हुए हैं। लेकिन सिख कौम के दिल पर लगा वो घाव आज भी हरा है। हर साल 1 नवंबर को गुरुद्वारों में अरदास होती है, मोमबत्तियां जलती हैं, और एक ही मांग उठती है – इंसाफ।

 

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है।

 

कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन के लिए 1 नवंबर का दिन ही क्यों चुना?

 

क्या कांग्रेस के रणनीतिकारों को नहीं पता कि इस दिन का क्या मतलब है? क्या उन्हें नहीं पता कि इस दिन ट्विटर-फेसबुक पर #NeverForget1984 ट्रेंड करता है, गुरुद्वारों में शोक सभाएं होती हैं?

 

राजनीति में तारीखों का चुनाव महज संयोग नहीं होता। अगर कांग्रेस को लोकतंत्र, संविधान या किसी अन्य मुद्दे पर विरोध करना ही था, तो साल के 364 अन्य दिन उपलब्ध थे। 1 नवंबर को ही प्रदर्शन रखना – चाहे वो अनजाने में हुआ हो या जानबूझकर – सिख भावनाओं के प्रति असंवेदनशीलता तो दर्शाता ही है।

 

यह सवाल किसी धर्म के खिलाफ नहीं है।

 

यह सवाल इंसाफ का है। यह सवाल सम्मान का है। एक समुदाय जो 1984 के बाद भी इस देश की तरक्की में सबसे आगे खड़ा रहा, जिसने कभी इस देश से शिकायत नहीं की, क्या उसके दर्द के एक दिन का भी सम्मान नहीं किया जा सकता?

 

कांग्रेस को आज देश को बताना चाहिए कि 1984 पर उसका स्टैंड क्या है? क्या वो आज भी इसे ‘दंगा’ कहेगी या ‘नरसंहार’ मानेगी? क्या पीड़ित परिवारों से माफी मांगने का साहस वो दिखाएगी?

 

इतिहास गवाह है, जो कौमें अपना इतिहास भूल जाती हैं, इतिहास उन्हें भूल जाता है। सिख कौम ने 1984 को माफ भले कर दिया हो, भूली नहीं है।

 

1984 के सभी बेगुनाह शहीदों को अटल लक्ष्य परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

 

*- संपादक, अटल लक्ष्य न्यूज़*

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