—
*पंजाबी सिनेमा पर सेंसर की कैंची: क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ हिंदी-इंग्लिश के लिए है?*
_‘चढ़दी कला’, ‘पंजाब 1984’, ‘कौम दे हीरे’ से लेकर हालिया ‘मस्ताने’ तक – पंजाबी फिल्मों पर CBFC की कैंची क्यों चलती है बार-बार?_
*हिंदी पत्रकारिता दिवस* पर जब हम ‘उदंत मार्तण्ड’ से शुरू हुई अभिव्यक्ति की यात्रा को याद कर रहे हैं, तब एक कड़वा सवाल पंजाब के कलाकारों का सीना छलनी कर रहा है – *क्या संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) पंजाबी जुबान में लागू नहीं होता?*
*1. दोहरा मापदंड क्यों?*
‘कश्मीर फाइल्स’ में 1990 का सच दिखाया जा सकता है, ‘केरला स्टोरी’ पर बहस हो सकती है, ‘उड़ता पंजाब’ कट-पिट कर रिलीज हो जाती है, लेकिन जैसे ही बात 1984, संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले या पंजाब के सामाजिक-धार्मिक ताने-बाने की आती है, *CBFC का लाल पेन चल जाता है।*
‘चढ़दी कला’ जैसी फिल्में जो सिख फिलॉसफी और चरित्र पर बनी हैं, उन्हें महीनों लटकाया जाता है। कारण? “लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ सकता है”। *सवाल ये है कि क्या पंजाब की जनता इतनी नासमझ है कि सिनेमा देखकर भड़क जाएगी?*
*2. सेंसर नहीं, सेल्फ-सेंसरशिप का दौर*
आज पंजाबी निर्माता स्क्रिप्ट लिखते वक्त पहले सोचता है – “ये सीन कटेगा या पूरी फिल्म बैन होगी?” *नतीजा:* इतिहास, धर्म और सामाजिक सच दब जाता है। कॉमेडी और कनाडा वाली लव-स्टोरी ही बचती हैं।
*क्या यही ‘विकसित भारत 2047’ का पंजाबी संस्करण है – जहां कलाकार डर के साए में लिखे?*
*3. CBFC का ‘पंजाब-फोबिया’*
आंकड़े देखें: पिछले 5 साल में हिंदी की 2% फिल्मों को ‘A’ या कट मिले, जबकि पंजाबी की 23% फिल्में या तो बैन हुईं या 20+ कट के बाद पास हुईं। *‘मस्ताने’ को 129 कट!* ये सिनेमैटिक मर्डर नहीं तो क्या है?
CBFC के नियम सबके लिए एक हैं, फिर *‘सम्राट पृथ्वीराज’ में तलवारें चल सकती हैं, लेकिन ‘मस्ताने’ में सिख इतिहास की तलवार पर ऐतराज क्यों?*
*4. समाधान क्या है?*
1. *क्षेत्रीय रिव्यू बोर्ड* – CBFC में पंजाबी भाषा, संस्कृति और इतिहास समझने वाले विशेषज्ञ अनिवार्य हों। दिल्ली में बैठा अधिकारी ‘मिरी-पीरी’ का मतलब नहीं समझेगा।
2. *पारदर्शी गाइडलाइन* – “लॉ एंड ऑर्डर” का हवाला देकर बैन लगाने से पहले राज्य सरकार की इंटेलिजेंस रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
3. *राजनीतिक इच्छाशक्ति* – पंजाब सरकार और केंद्र का सूचना प्रसारण मंत्रालय मिलकर ‘पंजाबी सिनेमा नीति’ बनाए।
*अंतिम बात:*
*कलम बिकेगी ना झुकेगी कभी* – ये सिर्फ पत्रकारिता का नहीं, सिनेमा का भी संकल्प होना चाहिए। पंजाब की मिट्टी ने भगत सिंह दिया, शिव कुमार बटालवी दिया। *अगर उनकी कहानी ही पर्दे पर नहीं आएगी, तो आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा कौन देगा?*
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ सत्ता की तारीफ नहीं, *सत्ता से सवाल भी है।* और पंजाबी सिनेमा वही सवाल पूछ रहा है। *उसकी आवाज दबाओगे, तो गूंज और तेज होगी। आखिर क्यों एक फिल्म से इतना डर।
*क्योंकि ‘चढ़दी कला’ सिर्फ फिल्म का नाम नहीं, पंजाब का स्वभाव है।* चढ़दीकला का अर्थ ही सब कि भलाई से है, तो आखिर इससे डर क्यों। सिख गुरु श्री गुरु हरगोबिंद सिंह ने छठे गुरु ने सिखों को मीरी पीढ़ी का यानि कि संत और सिपाही वाला विजन दिया। क्या पंजाब के लोगों को उनके इतिहास से रूबरू कराना गलत है क्या और आखिर कब तक पंजाबी फिल्मों में ही सेंसर बोर्ड की तलवार कैंची रूपी चलती रहेगी क्या पंजाबी फिल्मों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। आखिर देश विदेश में बसा पंजाबी सिख आज ये सवाल आपने से कर रहा है। आखिर कब तक सेंसर बोर्ड पंजाबी फिल्मों पर ही कुठाराघात करता रहेगा।
*‘अटल लक्ष्य’ का वादा – सच वही जो दिखे, लिखे और पर्दे पर भी दिखे।*
